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निःस्वार्थ प्रेम दिवस

वेलेंटाइन डे, अर्थात निः स्वार्थ प्रेम-दिवस क्या प्रेम जिंदा है समाज में या सिर्फ आकर्षण या हवस तक सिमट कर रह गया।आज हम रोम के क्रूर शासक जो तीसरी शताब्दी में वहाँ  विवाह न करने का आदेश दिया उसके खिलाफ संत वेलेनटाईन ने आवाज उठायी बल्कि कईयो की शादी भी करायी थी जिसके कारण उन्हें जेल जाना पडा और अंत मे 14 फरवरी को वेलेंटाईन को फांसी दे दी गई।तभी से इस दिन को निः स्वार्थ प्रेम दिवस के नाम से मनाया जाने लगा।

आज अगर ढूंढा जाय तो कितने लोग निः स्वार्थ मिलेंगे शायद न के बराबर प्रेम प्यार मुहब्बत सिर्फ स्वार्थ की बेदी पर चढने लगे है पार्को मैदानो पिकनीक प्वाइंटो पर जोडे तो मिलते है लेकिन उन जोडो में कितनी को सफल जिंदगी या जीवन मिलता है यह कहने की जरूरत नहीं ।वेलेंटाइन डे पर उपहार देना लेना बुरी बात नही प्यार करने में भी कोई बुराई नही लेकिन निः स्वार्थ भाव से निभाना शायद कठिन है ।

वैसे आज कल के युवा फैशन के आगे अपने आदर्श और मूल सिद्धान्त को तरजीह नही देते यह सोचनीय है।दिल के बजाय सुन्दरता और फैशन पर जल्द आकर्षित होते हैं जो शायद लंबे समय तक न चलने वाला प्यार हो जाता है। अदालतों में तालाक सम्बन्धी मुकदमें का बढ़ता जखीरा इस बात की गवाही चीख-चीख कर दे रहा है कि मनमौजी फैसलो के कारण आज अदालतो में भीड दिन प्रतिदिन बढ रही है।जिसका मूल कारण स्वार्थयुक्त प्रेम है।अगर वह निः स्वार्थ होता तो आज अदालतो में इतनी भीड न होती । कहने का तात्पर्य है कदम वही तक बढने चाहिए जहाँ से सही सलामत घर वापसी हो सके।                                     

प्रेम
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प्रेम का रस निः स्वार्थ भला
पीजै तो सब काज प्रियै।

प्रेम की मीठी एहसास भला
महसूस कीजै तो जानू प्रियै।

प्रेम तो त्याग प्रियै
जो त्यागे वही जाने
प्रेम की भाषा मीठा मीठा
प्यार न जाने कडवा बोल प्रियै।

प्रेम का आभास आँखो का
नजरो का है वार प्रियै
प्रेम न दिल का भार
यह तो दिल का आभास प्रियै।

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