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कविता

गाय हमारी माता है

वे बहुत तिलमिला गये
घनघोर पाप !
हम नहीं मानते आपकी इस थिअरी को
ये यूरोपीय लोगों की थिअरी है
रहे होंगे उनके पूर्वज बंदर
चलते होगे वे चार पाँवों से
हम ! हम तो मनु की संतानें हैं
हम तो हमेशा से दो ही पाँवों से चलते आ रहें हैं।
हम ईश्वर की संतान !
ब्रह्म सत्य है !

उन्होंने हिक़ारत से देखा
उनका नाक फूल गया
माथे पर सल पड़ गये
फूफकारते हुए जोर से साँस छोड़ा…हूँ हूँ हूँ

आपको ग से गाय पढ़ाते हुए शर्म आती है
अरे मूर्खों ! गाय हमारी माता है !
आपको माता बोलते हुए शर्म आती है !

मैं सोच रही थी –
यह है तत्त्व की भाषा !
ईश्वर-प्रगट जीव की भाषा!
चौपाये के सत्य की भाषा!

सच है
“गुरुत्‍वाकर्षण लोगों के प्‍यार में गिरने के लिए जिम्‍मेदार नहीं होता”।

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